कहानी—“हम-तुम कुछ और बनेंगे” published in grih shobha jan 1st 2017
कहानी—“हम-तुम कुछ और बनेंगे” बगल के कमरे से अब फुसफुसाहटें आ रहीं थीं. कुछ देर पहले तक उनकी आवाजें लगभग स्पष्ट ही आ रहीं थी. बात कुछ ऐसी भी नहीं थी फिर दोनों इतने ठहाकें क्यों कर लगा रहें. जाने क्या चल रहा है दोनों के बीच , वार्तालाप और ठहाकों का सामंजस्य उसकी सोच के परे जा रहा था. उफ़! तीर से चुभ रहें हैं , बिलकुल निशाना बिठा नश्तर चुभो रही है उनकी हंसी. रमण का मन किया कि वह कोने वाले कमरे में चला जाये और दरवाजा बंद कर तेज संगीत चला दुनिया की सारी आवाजों से खुद को काट ले. परन्तु एक कीड़ा था जो कुलबुला रहा था , काट रहा था ह्रदय क्षत विक्षत कर भेद रहा था , पर कदमो में बेड़ियाँ भी उसी ने डाल रखा था. वह कीड़ा बार बार विवश कर रहा था कि वह ध्यान से सुने कि बगल के कमरें से क्या आवाजें आ रही हैं , " जीवन की बगिया महकेगी , लहकेगी , चहकेगी खुशियों की कलियाँ झूमेंगी , झूलेंगी , फूलेंगी जीवन की बगिया..." , काजल इन पंक्तियों को गुनगुना रही थी. “ रोहन को अब सीटी बजाने की क्या जरूरत है इस पर ? बेशर्म कहीं का...." सोफे ...

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