"शिद्दत-ए-एहसास" साहित्य अमृत में प्रकाशित

शिद्दत-ए-एहसास
        कमरें में दमघोंटू घुटन छाई जा रही थी. दर्द अपनी सीमायें चीर सहस्त्र बाहुओं से कंठ अवरुद्ध करने को आमादा था. वैसे भी वहां जीना कौन चाहता था. पर एक दूसरे को मरता भी नहीं देखा जा रहा था. हर आती सांस बेमतलब और बेमानी थी. क्या करना था उन अनचाही साँसों का. रोम रोम चीख चीख नकार रहा था, पर बेशर्म साँस फिर भी हर पल आ कर खड़ी हो जाती. निर्लज्ज हो हर पल जीने को विवश कर जाती. दो लोग मिल कर संघर्ष कर रहें थें कि किसी तरह जिन्दगी को ठुकरा दिया जाये. पर जिन्दगी खुद ब खुद हर क्षण गले पड़ी जा रही थी.
    सब्र और बर्दास्त ने जब अपनी हदों का पूर्ण अतिक्रमण कर दिया तो अल्पना उठ खड़ी हुई, एक भरपूर नजर सामने तड़पते हर्ष पर डाला और कार की चाभी ले तेजी से निकल पड़ी. कहा जाये दौड़ ही पड़ी, हर्ष अपनी नाम का अर्थ खोता हुआ विषाद और नैराश्य भाव से जाती हुई अल्पना को देखता रहा. उसमें इतनी भी जिजीविषा शेष नहीं थी कि मौत को गले लगाने जा रही अपनी पत्नी अल्पना को रोक ले. प्यार की ये भी एक चरमोत्कर्ष भाव ही है कि प्रिय की वेदना यदि किसी तरह दूर होती है,तो बस हो ही जाये, चाहे वह मौत को गले लगाने से प्राप्त होती हो. जाती हुई अल्पना ने पलट कर भी नहीं देखा. कितनी हड़बड़ी है उसे मुझे छोड़ कर जाने की, हर्ष ने सोचा या शायद नहीं ही सोचा. हर पल साँसों का कारावास जीता व्यक्ति शायद इतना नहीं सोचता होगा.
    अल्पना तेजी से बरामदा पार करती हुई पोर्टिको तक जा पहुंची, हड़बड़ी में भी उसने वहां मौजूद अदृश्य खून के कतरे को कूदते हुए पार किया जो सिर्फ १३ दिन पहले ही वहां धार बन बह रहा था. उसका खून, जिसे उसने एक-एक बूँद दूध पिला निर्मित किया था. हर्ष ने भी लक्षित किया इस बात को कि १३ दिन पहले जहाँ अंकित का दुर्घटना ग्रस्त मृत शरीर रखा गया था, अल्पना ने उस पर पावं नहीं रखा. मानों वह अभी तक वहीँ सोया पड़ा है. “अंकित” उसका एकमात्र संतान, जो घर के सामने की सड़क पर ही एक अनजान मोटर साइकिल वाले के धक्के से यूं चल बसा मानों सिर्फ इसी खातिर ही वह आया था इस दुनिया में. जब यही नियती थी तो 20 वर्ष तक ही अंकित क्यूँ रहा, ये दुर्घटना तो उसके साथ ७० साल की उम्र में भी हो सकती थी. वह तो मेडिकल की पढाई कर रहा था. १०-१२ दिनों तक दोस्त रिश्तेदार सब घेरे रहें. आज अचानक जब सिर्फ वो दोनों ही बचें तो शायद अंकित का ना होना ज्यादा खल गया.
    अल्पना आवेश में कार निकाल सड़क पर अपनी तरफ से फुल स्पीड कर चल पड़ी. इस से पहले सिर्फ तीन या चार बार ही उसने कार चलाया होगा. अंकित ही तो सिखाया करता था, क्यूँ चला गया बिना सीखाये, ये सोचते उसने और तेज कर दी. रात आधी से ज्यादा बीत चुकी थी कि बीच सड़क पर अंकित स्काई ब्लू शर्ट और नेवी ब्लू जीन्स में खड़ा दिखा. जो तेजी से हाथ हिला शायद कार रोकने ही बोल रहा था. चौंकती हुई अल्पना ने तेजी से ब्रेक पर पावं दबाया,
“आंटी आधी रात आप कार चला कहाँ जा रहीं हैं?”, शीशा नीचे करते हुए अल्पना ने देखा कि ये अंकित नहीं उसका दोस्त शुभ्र है. शुभ्र ने निढाल होती अल्पना को संभाला और घर तक पहुंचा गया. पता नहीं क्यूँ, पर लौटती हुई अल्पना का मन उतना उद्वेलित नहीं था. उसने एक बार  भी ये ध्यान नहीं दिया शुभ्र आखिर इतनी रात गए क्या कर रहा था वहां. उसे तो ऐसा ही महसूस हुआ कि वह अंकित ही रहा होगा जिसने उसे घर छोड़ा. आज १३ दिनों के बाद उसे अपने कान्हा को देखने की इच्छा हुई.
  हर्ष वैसे ही जीवित-मृत की बीच वाली स्थिती में, लौटती हुई अल्पना को देख रहा था. परन्तु अल्पना तेजी से पूजा वाले कमरे में चली गयी. १३दिनो के बाद ये कमरा खुला था, इस बीच उसने कभी आ कर शिकायत भी नहीं किया था कि कान्हा ने अंकित को क्यूँ बुला लिया. धम्म से बैठती हुई अल्पना ने गौर किया कि १३ दिन  पहलें के चढ़ाये फूल आज  भी ताज़े ही लग रहें थे. कान्हा की मूर्ती मनमोहनी मुस्कराहट बिखेरती उसे सम्मोहित कर रहे थे. उसके दुःख और विषाद की कही परछाईं परिलक्षित नहीं थी. पूजा घर एक सकारात्मक उर्जा से मानों तरंगित था. फिर अभी अंकित से मिलने का आभास, अल्पना को एक आस भरी स्फूर्ति से नवजीवन का संचार कर गयी. कुछ क्षण पहले मृत्यु को गले लगाने को आमादा इंसान वहीँ पूजा घर की फर्श पर गहरी नींदें ले रहा हो अपने आप  में एक आश्चर्यजनक बात थी.
    सुबह अगरबत्ती की खुशबू जब नथुनों से टकराई तो हर्ष आँखें मलता, उलझे बाल अस्त -व्यस्त कपड़ों में गिरता हुआ सा उठा और खुशबू की दिशा में खुद को घसीटता चल पड़ा. पूजा घर के दरवाजे पर उसने अचंभित भाव से देखा, अल्पना नहा धो स्वच्छ साड़ी में हाथ जोड़े कान्हा के समक्ष  ध्यानमग्न है. अचानक हर्ष की तन्द्रा टूटी कि ये कैसी माँ है, क्या हुआ इसे. हर्ष को खड़ा जान, अल्पना उठ कर आई और उससे लिपटते हुए कहा.
“ रात सपने में अंकित आया था बोल रहा था कि वह कहीं नहीं गया है. अंकित यहीं है हमारे साथ, कल उसी ने तो मुझे वापस घर पहुँचाया था ..... “
हर्ष अल्पना की हालत देख और टूट गया, उसे एहसास हो गया कि ये अपना संतुलन खो रही है. उसके बाद तो अल्पना ऐसे जीने लगी मानों कुछ हुआ ही नहीं हो, अंकित के बारे में ऐसे बातें करती जैसे वह यही कहीं हो. अंकित की पसंद की डिशेस बनाती. हर्ष जहाँ ब मुश्किल दो चार कौर निगल पाता वही अल्पना स्वाद ले कर खाती. सो कर जब उठती तो ऐसा मालूम होता कि वह बेटे से मिल कर आ रही हो, अंकित की इतनी बातें करती. सांत्वना देने आने वालें  भौचंक हो अल्पना की हालत देख दुखी हो जातें पर अल्पना मानों दुखी होना छोड़ चुकी थी.
 उस दिन अंकित का जन्मदिन था, हर्ष की हालत रात से ही काफी बिगड़ रही थी. अल्पना खुद जा कर डॉक्टर को बुला लाई थी. शायद नींद की किसी दवा का असर था कि हर्ष उस दिन देर तक सोया रह गया था. किसी से बातें करने की अल्पना की आवाज से ही उसकी नींद टूटी थी, घिसटते हुए उठा तो देखा पूजा घर में अल्पना जन्मदिन का पूरा माहौल बनाये कान्हा जी की मूर्ति से बतिया रही है. केक,मिठाई, फल और कई व्यंजन….
“ हर्ष आओ अंकित का जन्मदिन मनातें हैं, पहले नहा कर आओ”,
हर्ष विछिप्त होती पत्नी को देखते रह गया. क्या हो गया है इसे?  कैसे इतना खुश हो रही है, हर्ष के अंदर बहुत कुछ दरक रहा था. पर अल्पना अपनी रौ में जन्मदिन मना रही थी. अंकित के दो-चार अच्छे मित्र भी उदास भाव से वहां बैठे थें.
“ जानते हो हर्ष, अंकित वापस आना चाहता है. कल उसने मुझसे कहा सपने में. बहुत तड़प रहा है वह आने को. चलो अच्छा है ना हमारा बेटा वापस आ जायेगा”.
“देखों बच्चो इस बार हम अंकित का जन्मदिन उसके बिना मना रहें हैं अगले साल वो हमारे साथ होगा, मुझे उसने बताया है”.
हर्ष का सर्वांग सिहर गया, कैसी बहकी बातें कर रही है अल्पना. आंसू पोछते वह वहां से हट गया और बैठक में जा कर अपनी साली, रंगोली को फोन किया कि उसकी बहन किस तरह का व्यवहार कर रही है. थोड़ी देर के बाद रंगोली का फोन आया उसके मोबाइल पर,
“ जीजाजी मैंने दीदी से बातें किया अभी, आपने सच कहा ये बातें तो बिलकुल बेसिरपैर की कर रही है पर रो नहीं रही है ये बात मुझे सुकून दे रही है. मैं अगले महीने आने का प्रयास करती हूँ. कोशिश करती हूँ कि माँ फिर वापस दीदी के पास ही चली जाये. आपलोगों को जरूरत है किसी देखभाल की”.    दो दिनों में हर्ष की सास फिर वापस आ गयी, वो भी अल्पना की हालत देख दुखी हो रही थीं. अल्पना दिन भर अपनी माँ से भी अंकित के लौट आने की संभावनाओं पर ही चर्चा करती थी. वैसे उसका ज्यादातर वक़्त पूजा घर में अपने कान्हा संग ही  बीतता. आये दिन बताती कि यदि अंकित को लौटना नहीं लिखा है तो उसके कान्हा कभी इतने मुस्कुराते नहीं रहते.
एकाध महीने में रंगोली भी आ गयी, आकर उसने महसूस किया कि माँ और जीजाजी चूँकि दीदी की बात से असहमत रहतें हैं तो वह दुखी हो जाती है , सो उसने उसकी बातों में हां में हां मिलानी शुरू कर दिया. रंगोली को भी विश्वास है कि अंकित आएगा ये जान अल्पना चहक उठी. पर रंगोली मन ही मन सोचती रहती थी कि एक असंभव बात, एक अनहोनी बात को कितने दिनों तक जीने के लिए दिलासा का हथियार बनाया जा सकता है. उसके खुद के बच्चे युवा हो चुके थें, छोटे रहते तो एक दीदी को दे देती. क्या गोद लिया जाए, पर इस वय में, जब दीदी ४४ और जीजा ५० के करीब हैं कोई भी संस्था क्यूँ कर गोद देगी. इसी उधेड़बुन में वह अल्पना  को ले कर एक लेडी डॉक्टर के पास परिक्षण हेतु पहुँच गयी. जब डॉक्टर ने बताया कि अल्पना का गर्भाशय किसी युवती के गर्भाशय के समकक्ष ही संतानोत्त्पत्ति के लायक है, तो आशा की नयी किरण जाग गयी दोनों बहनों के मन में. माँ ने जब ये सुना तो बहुत नाराज हुईं कि रंगोली, अल्पना के केस को और बिगाड़ ही रही है ऐसी हरकतों को  बढ़ावा दे कर. हर्ष ने तो सर ही पीट लिया अपना, कि अभी अंकित को गुजरे कुछ महीने भी नहीं गुजरें है और ये सब बेहूदगी.
 अल्पना जहाँ जिन्दगी के नवनिर्माण की ईंटे जमा करने की जद्दोजहद में लगी थी वहीँ हर्ष के अंदर का बाप, विछोह की विखंडित दीवार तलें टूट रहा था. अल्पना जहाँ अंकित की पुनर्जन्म और लौटने के स्वपन में लिप्त रहती वहीँ हर्ष पुत्र का दिवंगत होना स्वीकार नहीं कर पा रहा था, उसके खोने का दर्द कहीं बहुत भीतर तक उसे छलनी कर रहा था. अपने कान्हा की मुस्कराहट से आश्वस्त अल्पना भविष्य को ले कर अति उत्साह और अति विश्वास में जी रही थी. एक असंभव को संभव करने की हर मुश्किल पार करने को प्रयासरत थी. वह देख रही थी कि जितना वह अंकित को लौटा लेने की स्वप्निल तस्वीर साकार करने की गुत्थी सुलझाने में व्यस्त हो रही है उतना ही हर्ष अपनी बिगड़ी तकदीर सीने में जब्त करने में असफल हो अपनी जीवन डोर कमजोर करने में. रंगोली अपनी दीदी को हर हालात में खुश या आशान्वित देख ही प्रसन्न थी. लोग अल्पना को पागल कहने लगे थे जो अपने एकमात्र पुत्र के जाने के बाद भी भजन गाती भाव-विभोर रहती, सजती संवरती,सब करती पर रोती नहीं.
   अंकित के जाने  के कुछ ही महीने बाद मौत ने फिर कुण्डी खटखटाया था, अबकी बारी हर्ष की थी. पर ये अप्रत्याशित नहीं था, किसी के लिए भी. सब जानते थे कि हर्ष ने स्वयं जीना छोड़ा था यहाँ मौत बदनाम नहीं हुई थी. अल्पना विस्फारित सजल नयन से घूरती रह गयी थी जिन्दगी के उस नए अनुच्छेद को.
   फिर एक दिन वह असंभव संभावना में परिवर्तित होता महसूस हुआ. जाते हुए हर्ष से अल्पना ने उसके अंश को अपने गर्भ में समाहित करने में सफलता प्राप्त कर लिया था……. हां, डॉक्टर ने पुष्टि कर दिया कि अल्पना माँ बनने वाली है. अपनी उम्र हालात परिस्तिथियों को पछाड़ते हुए उसने अपने अंकित को रोपित कर ही लिया था अपने भीतर. बड़ी ही सहजता से उसने हर्ष का जाना स्वीकार कर लिया था. उसे पागल समझने वाले उसकी अदम्य इच्छा शक्ति के आगे नतमस्तक थे. नानी-दादी बनने वाली उम्र में उसने एक पुत्र को जन्म दिया. ऑपरेशन थिएटर से बाहर आने पर उसने देखा रंगोली, उसकी माँ सहित अंकित के बहुत सारे मित्र और मिडिया-प्रेस के बहुत सारे लोग भी खड़े थें. अंकित के दोस्तों को देखते हुए अल्पना ने कहा,
“ मैं कहती थी ना अंकित का नाम अपने मोबाइल से ना हटाओ, लो मैं ले आई अंकित को”.
मौलिक और अप्रकाशित
RITA GUPTA











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