सुनो बेटा गृहशोभा द्वितीय में छपी २०१७

सुनो बेटा

"माँ मुझे अपनी सहेली निशा के घर जाना है ,उसने बहुत अच्छे से नोट लिखा है आज क्लास में .कल टेस्ट है ,एक बार उस के घर जा कर पढ़ आती हूँ .चौक के पास ही तो रहती है स्कूटी से तुरंत ही जा कर आ जाउंगी ", राशि ने अपनी माँ सुधा से पूछा .
"ये कोई वक़्त है लड़कियों के घर से बाहर निकलने की ? देख रही हूँ सुधा तूने इसे कुछ ज्यादा ही छूट दे रखा है . कुछ ऊंच-नीच हो जाएगी तो सर धुनते रहना जीवन भर ", माँ तो बाद में बोलती ,राशि की दादी ही पहले बोल उठी .
"तुम्हे क्लास में ही उससे नोट ले लेनी चाहिए थी ,आखिर रात होने की तुमने इन्तजार ही क्यूँ किया ?",पापा ने घर में घुसते ही प्रश्न उछाल दिया .
"बेटा उस टॉपिक को छोड ,तुम बाकी पढ़  लो, अब सही बात है ना रात नौ बजे तुम्हारा बाहर जाना उचित नहीं ", माँ ने भी समझाईश वाले टोन में कहा .
मन मसोस राशि ,बैठ कर पढने लगी .कोई एक घंटे के बाद उसका भाई ,अपने कमरे से निकला और "माँ शाम से बाहर नहीं निकला हूँ एक चक्कर लगा कर आता हूँ " का जुमला उछाल ,अपनी बाइक ले बाहर चला गया .कहीं से कोई आवाज नहीं आई .किसी ने ना कुछ पूछा या समझाया .
       आम भारतीय घरों में कमोबेश यही स्तिथि है . बेटी को तो छुटपन से ही आचार-व्यवहार सीखातें रहेंगे .कभी दूसरे के घर जाना है के नाम पर तो कभी जमाना बहुत ख़राब है के नाम पर . ऐसे ना बोलो ,ऐसे ना चलों ,ऐसे ना करो और वैसे ना करों की लम्बी फेहरिश्त होती है ,बेटियों को सीखाने के लिए . कभी सीधे सीधे तो कभी घूमा-फिरा कर लड़कियों को बताया जाता है कि रास्तें में शोहदों को कैसे नजर अंदाज करना है .कोई फब्ती कसे तो कैसे चुपचाप कोई बखेड़ा खड़ा किये कट लेना चाहिए . अगर कोई ऊंच -नीच हो भी जाए तो गलतियां खोज एक लड़की को ही कसूरवार  ठहराया जाये कि उसने कपडे ही ऐसे पहने थे या रात के वक़्त कहीं भले घर की लडकियां बाहर घूमती हैं . अखबार में छपी बलात्कार के ख़बरों को सुना कर एक तरह से और भीरु ही बनाया जाता है बच्चियों को .

     ....  और बेटों  के लिए यही सोच है कि,अरे लड़का है इसके लिए क्या सोचना है .कोई लड़की है क्या जो फिक्र किया जाएँ कि कहाँ जा रहा है ,क्या  कर रहा है . दरअसल ,परेशानी इसी सोच से है .
क्या ऐसा नहीं लगता कि परेशानी दरअसल लड़कों से ही है ? कभी हम सुनतें हैं कि कुछ लड़कियों ने मिल कर एक लड़के के साथ छेड़खानी किया , बलात्कार किया या कुछ ऐसी  ही ख़बरें ? नहीं ना .सड़कों पर तेजी से दोपहिया वाहन चला,कुछ अपवादों को छोड़   दुर्घटना ग्रस्त या मरने वाले भी ज्यादातर लडकें ही होतें हैं , जबकि दोपहिया तो लडकियां भी अब चलाती ही हैं .
लड़कियों को उनसे बचने और डरने की ही कोरी शिक्षा दी जाती है . क्या ऐसा नहीं लगता कि भारतीय घरों  में अब लड़कों को भी छुटपन से समाज के नियम समझाना चाहिए . लडकियां बहुत समझदार और संवेदनशील पहले से ही हैं .अब कुछ ज्ञान लड़कों को भी दिया जाना चाहिए . एक तो छुटपन से ही बेटों को लोग बोलते हैं , "अरे लड़की हो क्या जो रो रहे हो ", "डरपोक तुम लड़की हो क्या ", "चूड़ियाँ पहन रखी हैं क्या ", "अरे तुम किचन में क्या  कर रहें हो  "........वगैरह वगैरह . इस तरह बोल उनको शुरू से ही संवेदनहीन बना दिया जाता है . इन बातों से  ,ऐसी सोच से उन्हें बताया जाता है कि लडकियां कमजोर होती हैं जो रोतीं हैं ,डरपोक होतीं हैं और चूड़ी पहनती है और रसोई का काम भी औरतों का ही है .
बेटों को भी बचपन से ही सीखना चाहिए कि लड़की की इज्जत किस तरह की जाये .माँ  का ये कर्तव्य है कि अपने जिगर के टुकड़े को वह सीखाये कि राह चलती किसी लड़की को कैसे ताका जाता है या कैसे नहीं घूरा जाता है  ,किसी औरत को कैसे इज्जत देनी चाहिए .अपनी मर्दानगी कहाँ खर्च करनी चाहिए .शेर पुत्तर बोल- बोल ,उन्हें शिकार करने की शिक्षा देने की जगह एक मानव ही तैयार करना चाहिए जिसमें मानवीय गुण भरपूर हो .उस की संवेदनाओं को, तुम तो लड़का हो बोल- बोल ,बचपन में ही कुचलना नहीं  चाहिए .
  कितना ही अच्छा  हो कि घर में बेटियों को नालायक लड़कों से बचने के गुण सीखाने के साथ साथ बेटों को लायक बनने के गुण भी बताया जाए . जिस तरह एक लड़की पर कई बंदिशें लगाईं जाती हैं लालन-पालन के दौरान ,लड़कों पर भी लगाई जाएँ . उसके आने-जाने,दोस्तों,बात चीत ,सोच सब पर निगाह रखी जाए. बच्चे तो बच्चे होतें हैं ,कच्ची मिटटी के बने ,जैसा चाहें हम उन्हें गढ़ लें .जैसा चाहें हम सोच रोपित कर दें .फिर क्या लड़का और क्या लड़की .
           आज जब हम किसी सड़क छाप मंजनू या कोई बलात्कारी या कोई हिटलरशाही पति को देखतें हैं जो मनमानी करना अपना हक समझता है तो ये समझ लेना चाहिए कि दोष उसकी  परवरिश की है . ऊपर कहानी में सुधा ने तो बेटी को बाहर जाने नहीं दिया कि कुछ अनर्थ ना हो जाए पर हो सकता है उसका भोला सा दिखने वाला लाल ही बाहर कोई अनर्थ कर आया हो .












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