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जब जाएँ बच्चों के साथ रहने सरिता

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जब जाएँ बच्चों के साथ रहने        शर्माजी अवकाश प्राप्ति के बाद अपनी पत्नी के साथ अपने छोटे से शहर में अपने बनाये हुए घर में एक तरह से आराम से ही रह रहें थें. अकेलापन और बच्चों से दूरी अवश्य खलती थी पर उन्हें और खास कर उनकी पत्नी को ये तसल्ली रहती थी कि वे किसी पर आश्रित नहीं हैं. साल में एकाध बार सपत्नी दो-चार दिनों के लिए वे दोनों बेटों के यहाँ घूम आतें और इसी तरह बेटे भी सपरिवार इनके पास से चक्कर लगा जातें. शर्माजी और उनकी पत्नी जब बेटों के यहाँ से घूम कर आतें महीनों उनकी जीवन शैली, छोटे घर और खान-पान पर चर्चाएँ करतें और सुकून के घूँट भरतें कि उन्हें बेटे के घर में रहने की जरूरत नहीं है. बेटों के भी बच्चें और काम की जिम्मेदारियां समय के साथ बढ़ते जा रहें थें सो वे आग्रह करतें कि माता-पिता ही आयें और अधिक दिन साथ रहें. पर शर्माजी को एक तरह से अपनी आत्मनिर्भरता पर अहंकार सा था. उन्हें महसूस होता कि जो उनकी जीवन शैली है वही श्रेष्ठ है, बच्चों को भी वैसे ही रहनी चाहिए. इसी तरह श्रीमती शर्मा को लगता कि जो उनकी रसोई में पकता आया है वही सही और संतुलित है, बहुओं की कार्य...

आप भी बनिए स्मार्ट वीमेन प्रभात खबर

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महिलायें और अंतरजाल  “भैया, अपने कंप्यूटर पर जरा ट्रेन के टिकट कटवा दो, अच्छू बाबु एजेंट का फ़ोन ही नहीं लग रहा” “हर दिन क्या नया डिश बनाऊं, उफ़!” “बिटिया इन दोनों कैटलौग के सिवा मुझे नयी डिजाइन तो आती नहीं” “उफ़, शरीर में हो रहे इन बदलावों के बारें में किससे पुछूँ?” “मैं अकेली अब बैंक कैसे जाऊँ?” “बच्चे के लिए कौन सा विषय/कॉलेज सही होगा”......   ऐसे हर दिन की अनगिनत समस्याएं होती हैं जो इन्टरनेट की अनभिज्ञता के चलतें महिलायें खुद को पराश्रित और असहाय समझती हैं. एक धारणा सी है कि इन्टरनेट और कंप्यूटर तो सिर्फ पुरुष ही चला सकते हैं. शहरी क्षेत्रों में तो फिर भी कुछ प्रतिशत महिलाओं को कंप्यूटर और इन्टरनेट का ज्ञान होगा, ग्रामीण इलाकों में तो नगण्य है. विश्व पटल पर जनसँख्या की दृष्टि से भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है, चीन के बाद इन्टरनेट इस्तेमाल करने में. पर वास्तव में देश के २६% लोग ही इन्टरनेट का इस्तेमाल करतें हैं और इसमें महिलाओं का प्रतिशत लगभग ३०% है. महिलायें किससे मदद लें - सबसे पहले तो घर में जो जानता हो, उसकी मदद लें. हो सके तो कंप्यूटर का कोई बेसिक ...

लेख- अकेलें हैं तो क्या गम है सरिता दिल्ली प्रेस

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लेख -  अकेलें हैं तो क्या गम है   अभी दो दिन पहले आये एक फोन ने मुझे चौंका दिया, मेरे दूर के एक बुजुर्ग रिश्तेदार का फ़ोन था. उन्होंने कहा,“एक सरप्राइज पार्टी है कल. होटल अंश में तुम सब चले आना शाम सात बजे तक और खाना मेरे संग खाना”.         शाम तक पता चला कि शहर में रहने वाले अन्य रिश्तेदारों को भी उनका फोन आया आया है. अचानक भूले बिसरे से हमारे ये बुजुर्ग चाचाजी हमारी चर्चा में आ गएँ. वर्षों पहले चाची जी का निधन हो चुका था. चाचाजी पेंशन पाते थे और एक सामाजिक संस्थान से जुडे थें. पहले तो बहुत दिन/ महीनें चाचीजी की गम में बीमार ही पड़े रहें थें. बाद में उनके ही एक मित्र ने उन्हें उस संस्थान से जुड़ने को प्रेरित किया. धीरे धीरे वे उसके क्रिया कलाप में व्यस्त रहने लगे थें. नियत समय से कुछ पहले ही मैं होटल पहुँच गयी थी, चाचाजी अकेले ही बैठे होटल मेनेजर से कुछ बातें करते दिखें. पता चला उन्होंने खुद ही अपना ८० वां जन्मदिन मनाने का फैसला किया और सभी जीवित दोस्तों और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया है. यहाँ तक कि दूसरे शहरों में रहने वाले उनके बच्चें...

होली हैप्पी वाली सुरभि प्रभात खबर भेजे हैं ०६/०२/२०१७

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होली हैप्पी वाली “देखो मैं कहे देता हूँ, मुझे ये होली वोली बिलकुल पसंद नहीं है. ये भी कोई त्यौहार है भला चेहरे को रंगवा कर गंदगी पुतवा कर खुश हुआ जाये....”, हर साल ये कहते रहतें. ये कहतें रहतें और मैं उनको रंगती रहती. जितना चिढ़ते उतना आनंद आता उन्हें रंग लगाने. होली के बहुत पहले से मेरी तैयारियां शुरू हो जाती. घर में सबके लिए नए कपडे खरीदना, उन्हें सिलवाने देना. क्या नया बनाना है-पकाना है. महरी धोबी बिल्डिंग के गार्ड सबके लिए त्यौहार के गिफ्ट लेना इत्यादि. दफ्त्तर में पहले ही सूचित कर देना कि होली के दो दिनों पहले से मेरी छुट्टी. होलिका दहन के भी पहले घर में मेरी होली शुरू हो जाती. पतिदेव सुबह उठते और और उनके रंगीन मुखड़े को देख घर के सभी लोग ठहाके लगाते. भुनभुनाते हुए वे वाश बेसिन पर जा चेहरा धोने का उपक्रम करने लगते और होली को उनके द्वारा कोसना जारी रहता… . “कोई भला व्यक्ति ऐसे कहीं करता है? अब और कुछ नहीं तो स्केच पेन से मेरा चेहरा तुमने रंग दिया”, ये कुढ़ते हुए कहते. इस तरह से इनका कुडकुडाना मुझे होली में दिवाली की फुलझड़ियों के छूटने का आभास दे देता और मैं रसोई घर से पुआ बना...

" वीणा के तार सी जिन्दगी" - दैनिक जागरण सप्तरंग पत्रिका पुननर्वा में प्रकाशित

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संशोधित कहानी-  वीणा के तार सी जिन्दगी         अनमना सा आकर्ष अपने क्यूबिकल में बैठा हुआ था. दफ्त्तर के आधे से अधिक लोग जा चुके थे. दो माह पहले आकर्ष भी अभी तक यहाँ नहीं दिखता वरन दफ्त्तर छोड़ने का रिबन वही काटता था. पर आज कदमों में मानों पत्थर बंध गएँ थे, उठ ही नहीं रहे थे. सच रख दिए ही गए थे पत्थर उसके मन, मानस और मर्म पर. बार- बार पूरानी उन्नत्ति का सौम्य मृदुल चेहरा उसे खींच रहा था अपनी ओर, पर हर बार कमर पर हाथ रखे शब्दों के चाबुक चलाती उसका नवीन अवतार समक्ष आ उसे परे हटा देती. उसे शादी के पहले के दिन भी याद आ रहें थें जब वह दफ्त्तर के बाद देर तक दोस्तों के साथ घूमता रहता, देर रात खाने-पीने के बाद घर सिर्फ सोने जाता था. परन्तु जब से उन्नत्ति मिली उसने खुद ही दोस्तों से किनारा कर लिया था. पर उन्नत्ति ने गजब रंग बदला था, जैसे कोई कीमती फिरोजी रंग के सिल्क ने पानी में जाते रंग छोड़ दिया हो... “क्यूँ यार आज घर नहीं जाना क्या? लगता है भाभीजी मायके चली गयी हैं?”,    रक्षित ने उसके कंधे पर हाथ रख कहा तो आकर्ष की तन्द्रा टूटी. देखा दफ्त्तर...

लोग क्या कहेंगे , गृह शोभा में छप चुकी

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लेख- खुशखबरी कब सुना रही हो    अपनी पढाई पूरी कर सिल्की को नौकरी शुरू किये बमुश्किल सात-आठ महीने ही हुए होंगे कि अगल बगल और रिश्तेदारों ने मानों जीना हराम कर दिया उसका. घर परिवार या पड़ोस में कहीं कोई शादी ब्याह या कोई भी गेट टूगेदर हो, उसे देखते ही मानों सवालों की बाढ़ आ जाती, “अरे! वाह सिल्की तुम तो बड़ी बड़ी दिखने लगी हो” “पढाई पूरी हो गयी? कहाँ जॉब कर रही हो? कितने का पैकेज मिलता है? “और बताओ क्या चल रहा है आजकल ...”, इस सवाल से सिल्की बहुत घबराती थी क्यूँ कि अगला सवाल उसे मालूम होता, “तब शादी कब कर रही हो? क्या किसी को खोज रखा है, तो बता तो हमें?......”, खीसें निपोरती कोई भी आंटी, बुआ या मौसी की आत्मीयता प्रदर्शित करते इस प्रश्न से उसे बड़ी कोफ़्त होती. फलत: उसने धीरे धीरे इन पारिवारिक समारोहों से खुद को काट लिया. “अरे जिसकी शादी/जन्मदिन/मुंडन में आये हो उसकी बातें करो, प्लेट भर खाओ. मेरी जोड़ी क्यूँ खोजने लगते हो”, सिल्की सोचती. वही हाल उसकी मम्मी था, जब भी फ्लैट की महिलाओं की मण्डली जमती उसे देखतें सब मानों मैरिज ब्यूरो खोल लेतीं, “मेरा बेटा सिल्की से तीन ...

मदर डे स्पेशल मेरी प्यारी माँ, प्रभात खबर इ पेपर में पब्लिश हुई

मदर डे स्पेशल मेरी प्यारी माँ, सादर चरण स्पर्श.    ‘माँ’ शब्द अपने आप में ही काफी परिपूर्ण है. इस एक शब्द में दुनिया की सारी भावनाएं समाहित हैं जिनपर अक्सर स्नेहिल और सहृदय भाव का वर्चस्व रहता है. मैंने महसूस किया है कि इस ममत्व पूर्ण भाव से आप भी बेहद अमीर हैं. पर मुझ अकिंचन के प्रति आपने सदा संकुचन भाव ही रखा इसे बरतने में. बड़ी बड़ी बातें माँ के सन्दर्भ में पढ़ती हूँ जो आप के समक्ष दम तोड़ देती हैं.   बचपन से मुझे पता है कि मैं आपकी चमन की एक जंगली झाड़ हूँ जो खुद ब खुद पनप गयी आपकी कोख में. मुझे आज भी अफ़सोस है कि भ्रूण परिक्षण के गलत नतीजे का मैं परिणाम हूँ. मेरे जन्म पर आपको सदमा सा लग गया था और आपने हॉस्पिटल वालों पर बच्चा बदलने का आरोप लगाया था. मैं समझ सकती हूँ कि बेटा जान आपने गर्भ में मेरी कितनी देखभाल की थी कि जन्म के पश्चात् आपके दूध पिलाने से इनकार के बावजूद मैं जिन्दा रही.   वह तो बाद में मेरा भाई कृष्णा आपकी खुशियों का तारणहार बन कर जन्मा तो आपकी बेनूर जाती जिन्दगी में रौनके-बहार आ गयी. कभी परदे की ओट से तो कभी आपकी पीठ से सटी मैंने आपको लाड़-प्य...

"आशा साहनी के बहाने" भारतीय भाषा परिषद् की साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' में प्रकाशित in october 2017

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आशा साहनी के बहाने ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग........ “इतनी रात गए किस ने की होगी फोन?”, हेमा ने आँखें मलते हुए साइड टेबल से चश्मा उठाया. नाम देख चौंक गयी. इतने बरस के बाद... घड़ी भोर के चार बजा रही थी, फोन के दूसरे सिरे पर मौजूद मनहूस चुप्पी उसके नस नस को सिहराने लगी. हेमा अब भी फोन लिए हुए बस अनुमान लगाने की कोशिश कर रही थी कि आखिर ऐसी गलती उनसे हुई कैसे. रिश्तों का जो अथाह बर्फीला समंदर फोन के दूसरे सिरे पर था, उस ग्लेशियर की पिघलने की आशा बिलकुल नगण्य थी. शायद सूरज कभी पश्चिम से उदय हुआ हो, पर उन की हेठी उन की अकड़ उन की सोच ना कभी परिवर्तित हुई है ना परिवर्तनशील होने की गुंजाईश शेष है. पर फोन तो आया और उन्हीं का आया.... .....हेमा ने उठ कर खिड़की से परदा सरकाया पर खिसक गए यादों पर पड़ें पर्दें. दोनों ही जगह उसका सामना हुआ घने अँधेरे से. इस अंधियारे में हाथ बढ़ा रिश्तों के उलझे सिरे को कैसे सुलझाये....   साल दो साल नहीं कोई बीस-बाईस वर्ष बीत गए होंगे. जब आखिरी बार वह “मम्मी” से मिली थी. कैसे भूल सकती है, उस मुलाकात को. उस आखिरी मुलाकात के भी चार साल पहले ही उसे घर निकाला दे ...