जब जाएँ बच्चों के साथ रहने सरिता
जब जाएँ बच्चों के साथ रहने शर्माजी अवकाश प्राप्ति के बाद अपनी पत्नी के साथ अपने छोटे से शहर में अपने बनाये हुए घर में एक तरह से आराम से ही रह रहें थें. अकेलापन और बच्चों से दूरी अवश्य खलती थी पर उन्हें और खास कर उनकी पत्नी को ये तसल्ली रहती थी कि वे किसी पर आश्रित नहीं हैं. साल में एकाध बार सपत्नी दो-चार दिनों के लिए वे दोनों बेटों के यहाँ घूम आतें और इसी तरह बेटे भी सपरिवार इनके पास से चक्कर लगा जातें. शर्माजी और उनकी पत्नी जब बेटों के यहाँ से घूम कर आतें महीनों उनकी जीवन शैली, छोटे घर और खान-पान पर चर्चाएँ करतें और सुकून के घूँट भरतें कि उन्हें बेटे के घर में रहने की जरूरत नहीं है. बेटों के भी बच्चें और काम की जिम्मेदारियां समय के साथ बढ़ते जा रहें थें सो वे आग्रह करतें कि माता-पिता ही आयें और अधिक दिन साथ रहें. पर शर्माजी को एक तरह से अपनी आत्मनिर्भरता पर अहंकार सा था. उन्हें महसूस होता कि जो उनकी जीवन शैली है वही श्रेष्ठ है, बच्चों को भी वैसे ही रहनी चाहिए. इसी तरह श्रीमती शर्मा को लगता कि जो उनकी रसोई में पकता आया है वही सही और संतुलित है, बहुओं की कार्य...